कानपुर अपहरण मामले पर CM योगी की बड़ी कार्रवाई, एडिशनल SP सहित 4 पुलिसकर्मी सस्पेंड

कानपुर: उत्तर प्रदेश का कानपुर जिला पिछले एक महीने से सुर्खियों में है. बिकरू कांड फिर बर्रा अपहरण कांड ने कानपुर पुलिस को कठघरे में खड़ा कर दिया है. जिसके बाद अब यूपी पुलिस के कामकाज पर सवाल उठ रहे हैं.  कानपुर में अपराध की बढ़ती फेहरिस्त और पुलिस की नाकामयाबी से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी नाराज हैं. उनकी नाराजगी का असर भी देखने को मिला है. सीएम योगी ने आईपीएस अफसर अपर्णा गुप्ता, तत्कालीन डिप्टी एसपी मनोज गुप्ता समेत 4 अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है. तत्कालीन एसओ बर्रा रणजीत राय थाना एवं चौकी इंचार्ज राजेश कुमार सस्पेंड कर दिया गया है.

सूत्रों का कहना है कि सीएम योगी कानपुर IG मोहित अग्रवाल, ADG जेएन सिंह, SSP दिनेश पी की कार्यप्रणाली से नाराज है. अपराध की घटनाओं को लेकर सीएम योगी पुलिस से बेहद नाराज हैं. सूत्रों ने बताया कि सीएम योगी ने बड़े अधिकारियों से कहा है कि कानपुर के पुलिस वालों ने कानून व्यवस्था को लेकर मेरे चल रहे अभियान को धक्का पहुंचाया है. इन पर सख्त करवाई की जरूरत है.

कानपुर शहर के बर्रा निवासी लैब टैक्नीशियन संजीत यादव का करीब एक महीने पहले 22 जून की रात को  हॉस्पिटल से घर आने के दौरान अपहरण हो गया था. इस मामले में कानपुर पुलिस की भूमिका शुरुआत से ही सवालों के घेरे मे रही है. चौतरफा किरकिरी होने के करीब एक महीने बाद पुलिस ने बर्रा अपहरण कांड का खुलासा किया. संजीत के अपहरणकर्ता कोई प्रोफेशनल अपराधी नहीं बल्कि उसके खुद के दोस्त थे. पुलिस ने इस मामले में पांच अभियुक्तों को गिरफ्तार किया है, सभी संजीत के दोस्त हैं. इस अपहरणकांड का मास्टरमाइंड ज्ञानेंद्र यादव था. पुलिस पूछताछ में आरोपितों ने कबूला कि 26 जून संजीत की हत्या कर उसका शव पांडु नदी में बहा दिया था. संजीत की हत्या करने के बाद 29 जून को अपहरणकर्ता ने संजीत के परिजनों को 30 लाख की फिरौती के लिए फोन किया था. हालांकि, अपहरणकर्ताओं ने सबसे ज्यादा चौंकाने वाला खुलासा ये किया कि उन्होंने फिरौती का बैग उठाया ही नहीं. ऐसे में एक बार फिर से कानपुर पुलिस के कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठ रही है. आरोप है कि पुलिस ने ही फिरौती की रकम अपहरणकर्ताओं को देने के लिए कहा था, लेकिन फिरौती का पैसा देने के बाद भी संजीत घर नहीं लौटा.

आरोपितों ने पूछताछ में ये भी बताया कि पैसों के लालच में संजीत का अपहरण किया था, क्योंकि वो बोलता था कि उसके पास बहुत पैसे हैं. आरोपितों ने फिरौती की रकम मिलने से इनकार कर दिया है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर फिरौती का बैग गया तो गया कहां.

कानपुर के बिकरू कांड को लेकर भी यूपी पुलिस की खूब किरकिरी हुई है. दो-तीन जुलाई की रात को बिकरू गांव में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी गई थी. पुलिस की टीम ने गैंगस्टर विकास दुबे को पकड़ने के लिए गांव में दबिश दी थी, लेकिन विकास दुबे पुलिसकर्मियों का खून बहाकर भाग निकला था. यहां तक की यूपी पुलिस उसे इधर-उधर ढूंढती रह गई और वो पुलिस को चकमा देकर मध्य प्रदेश के उज्जैन में महाकाल मंदिर तक जा पहुंचा.  10 जुलाई की सुबह जब यूपी एसटीएफ की टीम उसे उज्जैन से कानपुर लेकर आ रही थी, तभी मुठभेड़ के दौरान उसकी मौत हो गई. विकास दुबे का एनकाउंटर भी सवालों के घेरे में हैं.

ऐसे में एक महीने के भीतर कानपुर में हुए इन दो बड़े कांड ने विपक्षी दलों को यूपी सरकार का घेराव करने का मौका दे दिया. इस दो घटनाओं के बीच अमेठी में सेना के जवान के पिता की धारदार हथियार से हत्या और गाजियाबाद में पत्रकार विक्रम जोशी के हत्याकांड ने आग में घी डालने जैसा काम किया. यूपी में एक के बाद एक अपराध के बढ़ने इस ग्राफ के बाद विपक्षी दल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस बयान पर चुटकी ले रहे हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि अपराधी या यूपी छोड़ दें या फिर अपराध छोड़ दें.

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